मेरी जिंदगी मेरी मर्जी

मेरी जिंदगी मेरी मर्जी

चलिए, आज आपको मिलवाते हैं एक बहुत ही प्यारे इनसान से। इनका नाम है उत्तम भगत। एक मध्यम वर्गीय परिवार में लड़के के रूप में जनमे उत्तम का एक बड़ा भाई और एक बड़ी बहन हैं। मां गृहिणी हैं और पिता डॉक्टर हैं। उन्हें किसी ने कहा नहीं पर उन्होंने समाज के रवैये को देखते हुए किशोरावस्था में स्वयं ही घर छोड़ दिया। वह दक्षिणी दिल्ली के एक फ्लैट में अकेले ही रहते हैं। अपने मन मुताबिक पहनना-संवरना उन्हें पसंद हैं। स्कूल-कॉलेज के दिनों में पढ़ाई में अव्वल आने वाले उत्तम अब बेहतरीन पेशेवर फैशन डिजाइनर हैं।

सुनीता तिवारी 

उत्तम बचपन से ही पढ़ाई में रुचि लेते थे, यही कारण है कि उनकी गिनती हमेशा ही लायक बच्चों में होती रही है। सेंट पॉल स्कूल, मसूरी व मानव भारती स्कूल, दिल्ली में वह पढ़ते थे। कॉमर्स विषय से ग्रेजुएट हैं। हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी फर्राटे से बोलते हैं। उनके पढ़े-लिखे होने का प्रमाण उनके सौम्य स्वभाव से मिलता है।

शौक बना करियर

हर इनसान के जीवन में कुछ न कुछ शौक होते ही हैं। कुछ लोग अपने शौक को इतना विकसित करते हैं कि वही करियर बन जाता है। उत्तम को अलग तरीके से कपड़े डिजाइन करने का शौक रहा है। हालांकि इसके लिए उन्होंने कोई अलग से कोर्स नहीं किया है। खुद ही फैशनेबल ड्रेस डिजाइन करने लगे। यहां वह अपने दोस्तों को धन्यवाद कहना नहीं भूलते क्योंकि उन्होंने ड्रेस डिजाइन करना अपने दोस्तों से भी सीखा है। 

अब उनके डिजाइन किए कपड़े कुछ चैनल के एंकर पहनते हैं। फैशन शो आदि के अलावा कई शो रूम में दिखते हैं। फैशन डिजाइन करने के अपने शौक के अलावा उन्हें घूमने-फिरने व शॉपिंग का भी शौक है। वह रैंप वॉक के लिए मॉडल्स को चलने-मुड़ने का सही सलीका भी सिखाते हैं।

समाज और सरकार

समाज को चाहिए कि जो जैसा रहना चाहे उसे वैसे ही स्वीकारें। वह मेट्रो पॉलिटियन सिटी में रहते हैं, तो उन्हें उतनी परेशानी नहीं होती। मगर कुछ छोटी जगहों पर लोगों का एकटक देखना और फिर मुड़-मुड़कर देखना उन्हें काफी अखरता है। समाज में जो जैसा है, उसे उसी तरह स्वीकारना चाहिए। 

समाज में हर तरह के लोग हैं, सभी सौ प्रतिशत समाज के मुताबिक नहीं होते। हर कदम पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। लड़कियों को ताड़ना, उन्हें छेड़ना, उन पर फब्तियां कसना कोई नई बात नहीं है। कितनी भी लड़कियों का सुरक्षा की जाए, यह सब तो होता ही रहेगा। 

सरकार ने दो समलिंगियों को साथ रहने अर्थात लिव-इन की अनुमति तो दे दी है, मगर विवाह के पवित्र बंधन में बंधने की अनुमति अभी भी नहीं मिली है। यह स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए।

अपने मन का करते हैं

“अलग रहने का कारण यही था कि किशोरावस्था आते-आते मुझे पूरी तरह लगता था कि लड़के के वेश में रहना मुझे घुटन देता है। मैं लड़कियों की तरह कपड़े पहनना, मेकअप करना पसंद करता था। मेरी चाल-ढाल भी लड़कियों की तरह ही रही है। 

मुझे पढ़ाई के दौरान बुली का सामना भी करना पड़ा। मगर मैं अपने मन का करता हूं। फैशेनेबल ड्रेस पहनना। बढ़िया मेकअप करना बहुत पसंद है। देखने वालों को कुछ अलग लगता है मगर जो भी इस तरह से रहते हैं वे प्राकृतिक होता है। 

हम सब मिलकर सप्ताह में एक दिन पांच सितारा होटल में गे-पार्टी भी करते हैं। सप्ताह भर काम में व्यस्त रहने के बाद जीवन को फुल एंज्वाय भी करते हैं।“ 

विवाह के बारे में सोचने का वक्त नहीं मिला

उत्तम से जब पूछा गया कि विवाह करेंगे तो एक लंबी सांस लेकर बोले कि सच पूछो तो मैं अपने करियर में इतना व्यस्त हो गया कि लगता है कि अब विवाह की उम्र ही निकल गई। अभी तक ऐसा कुछ नहीं सोचा। हो सकता है आगे कोई मिल भी जाए। वैसे सच तो यह है कि बहुत मेहनत करने के बाद भी वह आज भी मेहनत कर रहे हैं। तय नहीं कर पा रहे कि कहीं कोई नौकरी की जाए या अपने इसी व्यवसाय को मेहनत से आगे बढ़ाया जाए। 

लोगों का काम है कहना

समाज के भेदभाव के रवैये के बाद भी फैशन स्टाइल में इतना नाम कमाना आसान नहीं था उसका कारण उत्तम ने बताया कि वह जब काम में लगे होते हैं तो वह काम मन लगाकर करते हैं। फिर कोई दाएं से कुछ कहे या बाएं से कोई आवाज आए वह ध्यान ही नहीं देते। केवल सामने की ओर देखते हुए अपना काम करते रहते हैं। 

वह सभी से यह कहना चाहते हैं कि लोगों को तो हर हाल में कुछ न कुछ कहना है। सुनने वाले को खुद को मजबूत बनाना होता है कि उसे कितना सुनना है, कितना नजरअंदाज करना है। सबको चाहिए कि समाज में रहते हुए दूसरों की सहानुभूति न बटोरकर, लोगों की दया का पात्र न बनकर अपने काम से खुद को साबित करके अपनी एक अलग पहचान बनाएं।

इनसान वही है जिसमें इनसानियत है

उत्तम यह नहीं देखते की कोई कितना अमीर है, फाइव स्टार होटल से खाता है या कोई मजदूर है जिसमें इनसान की कद्र करने का जज्बा है वही उनकी नजर में इनसान है। हर किसी का अपना जीवन जीने का एक अलग अंदाज होना चाहिए। सबको अपनी अपनी तरह से जीना चाहिए, क्योंकि यह जीवन न मिलेगा दोबारा।