सहारा टेक्नोलॉजी का

सहारा टेक्नोलॉजी का

सीखने की सच में कोई उम्र नहीं होती। टेक्नोलॉजी को अपनाने के अपने ही फायदे हैं। पढ़िए और जानिये

प्रशांत दीक्षित

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने लेखों में टेक्नोलॉजी को तकनीक का नाम दिया था। शायद उनकी मंशा पाठको की सहूलियत बढ़ाने की थी। वाजिब था। क्योकि टेक्नोलॉजी और उसका हिंदी अनुवाद यांत्रिकी दोनों ही आम उपयोग में मुश्किल थे। हालाँकि अंग्रेजी बोलने वालों को कोई मुश्किल नहीं होती थी, कम से कम टेक्नोलॉजी शब्द के उच्चारण में I हाँ, आ, औ और ऊ को कैसे बोला जाये इस पर विवाद होता था लेकिन यह कह कर टाल देते थे कि आखिरकार अंग्रेज़ों की भाषा है जिसमे अगर पी यू टी पुट है तो बी यू टी बट क्यों है I चूंकि मैं हिंदी माध्यम से पढ़के आया था , आठ वर्ष की उम्र में , मेरे स्कूल में टीचर्स इस बात में ज्यादह ज़ोर देते थे कि हर अंग्रेजी के शब्द का उच्चारण ठीक होना चाहिए भले हमें उसका अर्थ समझ में न आये.

एक दस्तक

लेकिन जब दस वर्ष का हुआ तब हमारी क्लास में एक साइंस के टीचर आये और उन्होंने हमारी आँखें खोल दीं। हम अपने आपको बड़ा चतुर समझते थे लेकिन इस टीचर ने क्लास में घुसते ही पूछा कि कौन बताएगा कि टेक्नोलॉजी क्या होती है। हम सब चुप रह गए और टीचर ने हमारी मुश्किलें भांप ली। फिर उसने छत की ओर देखा और एक जलते हुए बल्ब की ओर इशारा करते हुए पूछा कि इसमें से रोशनी कैसे आ रही है। कोई नहीं बोला। तब उसने बड़े प्यार और धैर्य से समझाया कि जब इलेक्ट्रिसिटी एक धातु की तार से गुज़रती है तो वह गर्म हो जाता है और बड़े रेजिस्टेंस ( प्रतिरोध – मांफ करें इससे आसान शब्द नहीं मिला ) का हो तो चमकने लगता है। लेकिन अब समस्या और गंभीर थी क्योकि अब हमें इलेक्ट्रिसिटी समझनी थी और हम सब इतना ही जानते थे कि अगर नंगे तार को छू लेंगे तो बड़ी ज़ोर से झटका लग सकता है और हमारी मौत भी हो सकती है।

इस मानसिक द्वन्द का उत्तर भी टीचर ने ही दिया, जब उन सवालों का समाधान करते हुए उन्होंने समझाया कि किसी भी गूढ़ विज्ञान को समझने के लिये एक केंद्रित अध्ययन की ज़रूरत होती है और रोज़मर्रा के जीवन में उस टेक्नोलॉजी को कैसे उपयोग में लाया जाये , हमारे लिए यही काफी है। अलबत्ता मेरे जीवन में इसी दीप ने रास्ता दिखाया। बड़ी टेक्नोलॉजी का उपयोग दरअसल मेरे एयरफोर्स में शामिल होने पर आया। मेरा करियर का पहला कदम १९६० के दशक में एयरफोर्स के डकोटा एयरक्राफ्ट से हुआ। उस ज़माने में वह बहुत उपयोगी एरोप्लेन था। उड़ाको की दुनिया में, और खासकर मेरे लिये एक टेक्नोलॉजी का उपयोग करने का रास्ता था। चूंकि मैं एक एयर नैविगेटर था मैंने सिर्फ एक सेक्सटैन्ट का उपयोग करके एक एयरप्लेन को १५०० किलोमीटर की दूरी तै करके अँधेरी रात में उसके गंतव्य तक ले गया। सेक्सटैन्ट में सिर्फ आकाशगंगा में फैले हुए चाँद , सितारों का उपयोग किया जाता है। यह एक बड़ी चुनौती थी।

एयरफोर्स की यादें

डकोटा एयरक्राफ्ट में सेक्सटैन्ट का उपयोग सुनकर आज की पीढियां शायद हसेंगी लेकिन मुख्य मुद्दा है टेक्नोलॉजी का सहारा और एक ऐतिहासिक पहचान कि टेक्नोलॉजी के बड़े व्यापक रूप से बदलती हुई पृष्ठभूमि में हमें उसके उपयोग को केवल चतुराई ही नहीं बल्कि सुरक्षित उपयोग से समझना पड़ेगा। इस विचारधारा का प्रमाण जल्दी ही देखने को मिला जब मैं एयरफोर्स के बॉम्बर जहा ज़में, वहाँ शामिल हुआ। मिलिट्री से जुड़े इस प्लेन में टेक्नोलॉजी का एक व्यापक रूप देखने को मिला। मैं ऐसे प्रकार के प्लेन का ऐरक्रूबना, जो कि ५४००० फ़ीट की ऊंचाई तक उड़ने का काबिल था और उस ऊंचाई से भी सटीक बम्बारी कर सकता था और वह भी दस सेकण्ड्स के अंतराल में। लेकिन इस रूप में भी बहुत सतर्कता से काम करना पड़ता था। प्लेन के लगे यंत्रों को सटीक आंकड़े देने पड़ते थे और १००० किलोमीटर्स से भी ज्यादह रफ़्तार से उड़ते हुए प्लेन में बड़ी पैनी नज़र रखनी पड़ती थी। ब्रिटिश एयरफोर्स ने इस प्लेन को हाइड्रोजन बम से भी लैस किया था। इंडियन एयरफोर्स के उपयोग पर टिप्पणी करना मैं उचित नहीं समझता इसके आलावा कि टेक्नोलॉजी की अपनी सीमायें हैं और जिनको समझना बहुत आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य है।

मेरे व्यक्तिगत जीवन के कुछ अनुभव मुझे आज तक नहीं भूलें है। १९७१ के युद्ध में ढाका से काली अँधेरी रात में दिल्ली लौटते हुए हमने पूरे उत्तर भारत को अँधेरे में डूबा हुआ पाया। यहां तक कि उड़ान के रास्ते में पथ प्रदर्शन के लिये सारे यंत्र बंद कर दिए गए थे। उस दौरान प्लेन में लगे यंत्रो के ही ज्ञानपूर्वक उपयोग करके हम अपने गंतव्य एयरपोर्ट पर पहुँच सके। उसी युद्ध के अंतराल में पश्चिमी पाकिस्तान के सरगोधा एयरबेस पर बम गिराने के बाद , बम कम्पार्टमेंट के दरवाज़े नहीं बंद हो रहे थे। बड़ी आपातकालीन समस्या आके खड़ी हो गयी जिसके कारण वापस आना दूभर हो गया था। ईंधन की भीषण कमी हो रही थी। उस वक्त टेक्नोलॉजी का पूरा उपयोग करके हम ४५००० फ़ीट तक चढ़ गए और सफलतापूर्वक लौट आये।

आज भी सहारा

टेक्नोलॉजी से जुड़े इन सारे अनुभवों का सार मेरे एयरफोर्स से अवकाशग्रहण करने के बाद फलीभूत हुआ। जितनी नयी टेक्नोलॉजी के रूप और प्रकार मेरे सामने उभर कर आये और जिनको आम आदमी झेलने से कतराता था, मैंने बिना किसी हिचकिचाहट के स्वीकार कर लिया। मैं अब ८१ वर्ष का हो चुका हूँ और पिछले दो दशकों से अपने कार में जीपीएस का उपयोग करता हूँ। लेखक होने के नाते, हिंदी और अंग्रेजी, दोनों में लिखना पड़ता है। यह काम मैं बड़ी चतुराई से अपने बीस साल पुराने डेस्कटॉप कम्प्यूटर पर अलग अलग सॉफ्टवेयर की पहचान से सफलता पूर्वक करता हूँ। फेसबुक और लिंक्डइन जैसे सोशल मीडिया जैसे आधुनिक माध्यम मेरे कब्जे में हैं जिनकी सहायता से मेरे लेख आम पाठक तक पहुँचाना संभव हुआ है। लेकिन सब उपलब्धियों के लिये न तो मुझे कोई खास ट्रेनिंग लेनी पड़ी और किसी पाठ्यक्रम का सहारा लेना पड़ा। बस टेक्नोलॉजी के दो उसूल याद रखने पड़े, प्रयास और सुरक्षा।

टेक्नोलॉजी को अपनाने के कुछ लाभ

  • आसान , फुर्ती से व्यापक संपर्क
  • इक्कीसवी सदी विज्ञान और टेक्नोलॉजी का युग है। इंटरनेट उसका एक अभिन्न अंग है जिसकी सहायता से सूचनाये
  • और जानकारी बड़ी आसानी से प्राप्त हो सकती है.
  • दूर रहकर भी अपने लोगो से संपर्क में रह सकते हो। व्हाट्सएप्प और मैसेंजर के द्वारा। सुनने में जटिल लेकिन
  • उपयोग करो तो धीरे धीरे आसान . भाई धैर्य तो हर नए अनुभव में रखना पड़ता है.
  • अगर समझने में मुश्किल हो रही हो तो वृद्ध लोग छोटे बच्चों से बेझिझक सहायता लेले। आखिर आपने भी तो अपने
  • बड़े बूढ़ों को सहायता दी थी। अगला कदम उठाइये।
  • कमोडोर प्रशांत दीक्षित रिटायर्ड एयर कमोडोर हैं और सामरिक विषयों के विश्लेषक हैं