माँ की इस सलाह को बेटी ने गाँठ बाँध ली और अपने सपनों को पूरा करने निकल पड़ी
नेहा दुसेजा
…
बेख़ौफ़ आज़ाद है जीना मुझे
बेख़ौफ़ आज़ाद है लड़ना मुझे…
यह गाना शायद हर लड़की के मुंह में चलता होगा जब-जब उसे अपने सपनों के लिए उड़ने का ख़याल आता होगा!
2017 में जब मुझे समझ आया कि मुझे लिखना पसंद है, तब तक मेरा पहले से ही बी.एड. में एडमिशन हो चुका था और घर वालों के हिसाब से अगले दो साल में ‘घर में एक टीचर बनने वाली थी’। अब उन्हें कौन समझाए कि मुझे तो ये करना ही नहीं है।
कहानी में थोड़ा पीछे चले जाते हैं जब छोटी नेहा जो अभी सिर्फ आठवीं कक्षा में थी। उसको सपने देखने का बहुत शौक था, और वो जब भी अपनी मम्मी से सवाल करती तो मम्मी एक ही जवाब देती थी “जब वक्त आता है सब हो जाता है”।
2007 में एक सीरियल आता था दिल मिल गए और कहीं ना कहीं खुद को टीवी के उस पार वाली दुनिया में इमेजिन करते हुए मैंने ठान लिया था कि अब तो मुंबई जाकर स्टेज पर मैं भी परफॉर्म करूंगी।
लेकिन कैसे?
क्योंकि स्मार्ट फोन तो हर घर में नहीं होता था।
लेकिन स्मार्ट दोस्त हम सबके पास होते थे।

स्मार्ट दोस्त
तो, गूगल होने के बावजूद फेसबुक वाले दोस्त पर ज्यादा भरोसा था क्योंकि मन की बात या तो दोस्त समझ पाता है या मम्मी? और यहाँ मम्मी के साथ वो मामला अभी तक जमा नहीं था।
इसलिए एक दिन उस फेसबुक वाले दोस्त ने स्टेप बाय स्टेप सब समझा दिया था कि मुंबई की टिकट देखो, जो तुझे एक फिल्म का डायरेक्टर खुद आकर देगा। बस तुझे एनएसडी (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) जॉइन करना होगा। वहाँ बहुत सारे एक्टर डायरेक्टर आते हैं और तू वहाँ जाएगी तो किसी न किसी की नजरों में तो तू आ ही जाएगी और फिर तुझे हीरोइन बनने का मौका खुद बा खुद मिल जाएगा।
बस इतना सिंपल है मुंबई जाना…
पर क्या इतना सिंपल था….? अहा… (नहीं)
जिस लेवल से उसने मुझे कनविन्स किया था न, मुझे पूरा यकीन था वैसे तो मैं कनविन्स कर ही नहीं सकती लेकिन फिर भी मैंने एक सही मौका देखकर मम्मी के सामने प्रपोजल देने का सोचा।
फूल प्रूफ प्लान और मम्मी
उत्तर भारत में लगभग 15 मई के आस पास बच्चों के स्कूल की छुट्टी शुरू हो जाती है। 14 मई का समय था और अगले दिन से स्कूल की छुट्टी लगने वाली थी।
तो मैंने सोचा अगर मम्मी ने स्कूल की पढ़ाई की दुहाई भी दी तो मेरे पास प्लान बी है यानी मम्मी को बोलूंगी मम्मी एनएसडी वाले समर कैंप भी रखते हैं उसी में एडमिशन दिला दो! फिर वो ना नहीं कर पाएंगी।
तो फूल प्रूफ प्लान ए और बी लेकर गई मैं मम्मी के पास! लेकिन मुझे लगता है कि सभी मम्मियों के पास प्लान डी, प्लान डांट होता है। मम्मी ने साफ कह दिया पहले पढ़ लो और फिर ये मुंबई के सपने देखना! लेकिन इतनी आसानी से कोई बच्चा मान जाए तो….
तो छोटी नेहा ने अपने सवाल जवाब की शुरुआत कर दी .…
“पर मम्मी कब भेजोगी फिर?”
“जब तुम सब कुछ खाओगी और अच्छे से पढ़ना शुरू कर दोगी!”
“मम्मी फिर 9वीं की छुट्टियों में भेजोगी?”
“सही वक्त आने पर भेजूंगी…”
“ये सही वक्त कब आता है?”
“जब वक्त आता है, सब हो जाता है…”
“ठीक है…”

हार नहीं मानी
ये बात बिलकुल सही है, कहीं न कहीं हमारे माता-पिता सही वक्त हमसे बेहतर जानते हैं। उस दिन छोटी नेहा थोड़ी सी उदास हो गई थी, लेकिन उसने हार नहीं मानी थी। उसने अच्छे से पढ़ना शुरू कर दिया, उसने खाने के नखरों को साइड रख दिया, सब खाना शुरू कर दिया। फिर चाहे वो मिक्स दाल हो या तोरी, घीया जैसी सब्ज़ियाँ। वह धीरे-धीरे डायरी के पन्नों में लिखना शुरू कर चुकी थी।
अब करते करते 9वीं, 10वीं, 11वीं और फिर 12वीं खत्म हो चुकी थी और कहीं ना कहीं ये सपना डायरी के पन्नों के बीच में दब चुका था।
अक्सर हम डायरी से तब बात करते हैं जब हमारे पास कोई बात करने वाला नहीं होता लेकिन उस साल मैंने अपनी मम्मी को खोया था। भीड़ में भी अकेला महसूस करना क्या होता है तब मैंने समझा था। दुनिया तो फेसबुक से आगे बढ़ चुकी थी। दरअसल अब और भी बहुत से संचार माध्यम जैसे कि व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम आदि आ चुके हैं
और मेरी डायरी के साथ मेरा रिश्ता एक बार फिर जुड़ गया था। खुद को मैंने बस पढ़ाई और घर में व्यस्त कर लिया था। पर एक दिन मेरी डायरी में मेरे जज्बात मेरे कॉलेज की दोस्त ने पढ़ लिए थे और मुझे कनविन्स करने लगी।
दोस्त: यार सब को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर ….. तू कितना अच्छा लिखती है?
नेहा: यार कुछ नहीं होता है ये सब मीडिया बकवास है।
दोस्त: नहीं भाई! तू कोशिश तो कर?
नेहा: अच्छा ये ट्राई करने से क्या हो जाएगा? कौन सी मेरी कहानियाँ और कविताएँ पढ़ के कोई बोलेगा आप मुंबई आ सकते हैं!
दोस्त: यार नेहा, तू कोशिश तो कर, “देख जब वक्त आता है सब हो जाता है”
यूनिवर्स का संकेत
ये वो वाक्य था, जो छोटी नेहा ने हमेशा सुना था। कुछ वक्त के लिए ऐसा लगा जैसे यूनिवर्स कुछ संकेत भेज रहा है। और अगर यह संकेत है तो एक बार फिर कोशिश करते हैं। अब धीरे-धीरे डायरियों में लिखी कविताएँ और कहानियाँ सोशल मीडिया पर जगह लेने लग गई थीं। और एक दिन इंस्टाग्राम स्क्रॉल करते-करते मैंने कुछ विज्ञापन देखा। एक कहानी लिखें और अगर हमें आपकी कहानी पसंद आती है तो आप अपनी कहानी बताने के लिए मुंबई आ सकते हैं!
मेरी जिंदगी में अनु मलिक या फराह खान जैसे कोई किरदार नहीं थे जो मुझे ये कहे कि आप मुंबई आ सकती हैं … लेकिन शायद वो थे।
मुझे अभी भी वो ईमेल याद है जो दिन के 3:15 मिनट पर आया था। उस मेल में लिखा था तुम मुंबई आ गई हो … मुझे मेरी लाइफ की असली फराह खान मिल गई थी … उस पल ऐसा लगा जैसे सालों की मेहनत, कोशिश सब सार्थक थी।
क्योंकि मम्मी ने समझाया था, जब वक्त आता है सब हो जाता है।
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नेहा दुसेजा वैसे तो अपनी कहानियों को लेकर बहुत सारी जगह जा चुकी हैं जैसे दिल्ली, मुंबई, इंदौर और भोपाल। हाल ही में उन्होंने अपना डेब्यू शो भी किया है दूरदर्शन के साथ। और अपनी जिंदगी का छोटा सा हिस्सा हर रोज अपने इंस्टाग्राम हैंडल (@nehaduseja.official_) पर शेयर करती है। उनका यह मानना है कि कहानियाँ हम सब के अंदर बसी हैं, बस उन्हें समझने की ज़रूरत है और एक कहानीकार होने के नाते जिस तरह से कहानियों ने उनकी पहचान बनाई है उसी तरह से वह अपनी दिलचस्प कहानियाँ लेकर सबके दिलों तक पहुँचना चाहती है।
